*अर्हम्*
प्रश्न: प्रेक्षाध्यान साधना का आधार है भगवान महावीर का 'संवर और निर्जरा' की साधना का दर्शन। प्रेक्षाध्यान की साधना से संवर और निर्जरा कैसे फलित होती है ? स्प्ष्ट करें।
उत्तर : कर्म बंधन का मुख्य कारण है कषाय(क्रोध, मान ,माया, लोभ ,राग ,द्वेष आदि) और मन वचन काया की प्रवृत्ति का संयोग ।संसारी व्यक्ति वृत्ति(कषाय प्रेरित)➡ प्रवृत्ति➡कर्म बंधन ➡ पुनरावृत्ति के चक्र में अनंत काल से संसार भ्रमण कर रहा है। प्रथमतः प्रेक्षाध्यान के अभ्यास से मन वचन काया की चंचलता का यथासंभव निरोध किया जाता है और चित को ज्ञाता द्रष्टा भाव में रखकर चित्त को कषाय प्रेरित वृत्ति के प्रभाव से मुक्त रखने का अभ्यास किया जाता है। निष्कर्ष रूप में वृत्ति निरोध व चंचलता निरोध से नए कर्म का बंधन कम होने लग जाता है ।यह संवर है। फलस्वरूप वृत्ति प्रवृत्ति कर्म बंधन पुनरावृत्ति का चक्र टूटने लग जाता है और आत्मा की शुद्धि प्रारंभ हो जाती है। प्रेक्षाध्यान में वचन काया की चंचलता का निरोध कर मन को किसी एक आलंबन पर केंद्रित (एकाग्र) कर चित को ज्ञाता द्रष्टा भाव में रखा जाता है , इस दौरान जितने भी कर्म वृत्ति के रूप में उदय में आते है वे ज्ञाता द्रष्टा भाव से देख लिए जाते हैं, वृत्ति प्रेरित प्रवृत्ति के द्वारा भोगे नहीं जाते। जिससे कर्म बिना कोई प्रभाव दिए खत्म हो जाते है यानि नया कर्मबन्धन नहीं होता।यह निर्जरा है इससे आत्मा की शुद्धि होती है। निर्जरा का दूसरा बिंदु यह है कि जब चित्त को ज्ञाता द्रष्टा भाव में रखने का निरंतर प्रयास किया जाता है , मन की एकाग्रता सधती है , चंचलता का निरोध सधता है , चित्त शुद्धि बढ़ती है तो कर्म शरीर में तीव्र प्रकम्पन होता है , कर्म शरीर का साम्राज्य हिल जाता है और एक साथ बहुत सारे कर्मो की निर्जरा हो जाती है। निर्जरा का तीसरा बिंदु यह हो सकता है कि जब साधक ज्ञाता द्रष्टा भाव मे स्थित है तो कर्म भोगे नही जाते , प्रवृत्ति में नही आते तो कर्म समाप्त होने की /निर्जरा की गति बढ़ जाती है और इससे कर्मों के उदय में आने की गति भी बढ़ जाती है, उदीरणा (समय से पहले कर्म को उदय में आना) होने लग जाती है। चूंकि हम ज्ञाता दृष्टा भाव मे स्थित है तो उनकी भी निर्जरा हो जाती है यानी कर्म बिना प्रभाव दिए आत्मा को छोड़ देते हैं। इस प्रकार संवर से नए कर्मो का बंधन कम होता जाता है और निर्जरा से पुराने कर्मो का बंधन टूटने लग जाता है और आत्मा क्रमशः शुद्ध होती जाती है और साधक जन्म मरण के चक्र से क्रमशः मुक्त होकर सिद्ध बुद्ध मुक्त हो जाता है।।
- राजेन्द्र मोदी
www.preksha.com
प्रश्न: प्रेक्षाध्यान साधना का आधार है भगवान महावीर का 'संवर और निर्जरा' की साधना का दर्शन। प्रेक्षाध्यान की साधना से संवर और निर्जरा कैसे फलित होती है ? स्प्ष्ट करें।
उत्तर : कर्म बंधन का मुख्य कारण है कषाय(क्रोध, मान ,माया, लोभ ,राग ,द्वेष आदि) और मन वचन काया की प्रवृत्ति का संयोग ।संसारी व्यक्ति वृत्ति(कषाय प्रेरित)➡ प्रवृत्ति➡कर्म बंधन ➡ पुनरावृत्ति के चक्र में अनंत काल से संसार भ्रमण कर रहा है। प्रथमतः प्रेक्षाध्यान के अभ्यास से मन वचन काया की चंचलता का यथासंभव निरोध किया जाता है और चित को ज्ञाता द्रष्टा भाव में रखकर चित्त को कषाय प्रेरित वृत्ति के प्रभाव से मुक्त रखने का अभ्यास किया जाता है। निष्कर्ष रूप में वृत्ति निरोध व चंचलता निरोध से नए कर्म का बंधन कम होने लग जाता है ।यह संवर है। फलस्वरूप वृत्ति प्रवृत्ति कर्म बंधन पुनरावृत्ति का चक्र टूटने लग जाता है और आत्मा की शुद्धि प्रारंभ हो जाती है। प्रेक्षाध्यान में वचन काया की चंचलता का निरोध कर मन को किसी एक आलंबन पर केंद्रित (एकाग्र) कर चित को ज्ञाता द्रष्टा भाव में रखा जाता है , इस दौरान जितने भी कर्म वृत्ति के रूप में उदय में आते है वे ज्ञाता द्रष्टा भाव से देख लिए जाते हैं, वृत्ति प्रेरित प्रवृत्ति के द्वारा भोगे नहीं जाते। जिससे कर्म बिना कोई प्रभाव दिए खत्म हो जाते है यानि नया कर्मबन्धन नहीं होता।यह निर्जरा है इससे आत्मा की शुद्धि होती है। निर्जरा का दूसरा बिंदु यह है कि जब चित्त को ज्ञाता द्रष्टा भाव में रखने का निरंतर प्रयास किया जाता है , मन की एकाग्रता सधती है , चंचलता का निरोध सधता है , चित्त शुद्धि बढ़ती है तो कर्म शरीर में तीव्र प्रकम्पन होता है , कर्म शरीर का साम्राज्य हिल जाता है और एक साथ बहुत सारे कर्मो की निर्जरा हो जाती है। निर्जरा का तीसरा बिंदु यह हो सकता है कि जब साधक ज्ञाता द्रष्टा भाव मे स्थित है तो कर्म भोगे नही जाते , प्रवृत्ति में नही आते तो कर्म समाप्त होने की /निर्जरा की गति बढ़ जाती है और इससे कर्मों के उदय में आने की गति भी बढ़ जाती है, उदीरणा (समय से पहले कर्म को उदय में आना) होने लग जाती है। चूंकि हम ज्ञाता दृष्टा भाव मे स्थित है तो उनकी भी निर्जरा हो जाती है यानी कर्म बिना प्रभाव दिए आत्मा को छोड़ देते हैं। इस प्रकार संवर से नए कर्मो का बंधन कम होता जाता है और निर्जरा से पुराने कर्मो का बंधन टूटने लग जाता है और आत्मा क्रमशः शुद्ध होती जाती है और साधक जन्म मरण के चक्र से क्रमशः मुक्त होकर सिद्ध बुद्ध मुक्त हो जाता है।।
- राजेन्द्र मोदी
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